Friday, August 29, 2025
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बिना अनुमति सैनिक की दस एकड़ जमीन की रजिस्ट्री, तहसीलदार ने नामातंरण किया खारिज

खैरपुर में साजिश के तहत बिना बिक्री नकल के बिक गई जमीन, उप पंजीयक की भूमिका संदेहास्पद
रायगढ़, 20 जुलाई। सरकार जमीनों की खरीदी-बिक्री में धोखाधड़ी रोकने के लिए लाख जतन कर ले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जिसको नियम विरुद्ध जमीनों के सौदे करने होंगे, वो रास्ते खोज लेगा। रायगढ़ के कारोबारी इसमें माहिर हैं। सैनिक को आवंटित जमीनों को भी बिना बिक्री नकल के आसानी से बेचा गया है, क्योंकि उप पंजीयक ने एकतरफा साथ दिया। नामांतरण के लिए तहसीलदार के पास प्रकरण पहुंचा तो उन्होंने देखते ही इसे खारिज कर दिया है। रायगढ़ जिला कई मामलों में नए-नए कीर्तिमान गढ़ता रहता है। जमीन हड़पने और धोखे से खरीदी-बिक्री कराने के मामले में तो यह रायपुर-बिलासपुर से भी आगे है। इस छोटे से शहर में तेज दिमाग वाले लोगों ने आवंटन जमीनों को हड़पने के लिए नए-नए पैंतरे आजमाए हैं।

सबकुछ जानते हुए भी जिला प्रशासन उन पर कार्रवाई नहीं कर सकता क्योंकि कई मजबूरियां हैं। ऐसा ही एक सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसमें पूर्व सैनिक को आवंटित जमीन भी बिना अनुमति, बिना बिक्री नकल के बेच दी गई। मामला खैरपुर की खसरा नंबर 568/2 रकबा 2.460 हे., 568/6 रकबा 0.089 हे. और 568/7 रकबा 0.340 हे. कुल 2.889 हे. की रजिस्ट्री का है। यह जमीन पूर्व सैनिक को जीवन-यापन के लिए आवंटित थी। 22 मई 2025 को इसकी रजिस्ट्री रायगढ़ उप पंजीयक तनोज कुमार भू-आर्य ने की। विक्रेता योगेश्वर पिता शिवप्रसाद निवासी रायपुर और उमाशंकर पिता शिवप्रसाद निवासी भोपाल ने यह जमीन रायगढ़ निवासी अमित अग्रवाल पिता हनुमान प्रसाद अग्रवाल को बेची।

भूमि का मूल्य 1,36,22,000 रुपए आकलित किया गया, जिसके एवज में करीब 8.99 लाख रुपए शुल्क चुकाया गया है। रजिस्ट्री के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना ही चुपचाप पंजीयन कर दिया गया और किसी को भनक तक नहीं लगी। मामला तब सामने आया जब यह प्रकरण नामांतरण के लिए तहसीलदार रायगढ़ के पास पहुंचा। तहसीलदार ने पाया कि यह भूमि पूर्व सैनिक को आवंटित हुई थी। इसको बेचने के पूर्व कलेक्टर से अनुमति लेनी जरूरी है लेकिन क्रेता-विक्रेता ने कोई अनुमति नहीं ली। यही नहीं, पटवारी ने बिक्री नकल या चौहद्दी भी नहीं दी। इसके बावजूद उप पंजीयक ने पंजीयन कर दिया।
1967 में हुआ था आवंटन
तहसीलदार रायगढ़ के पास जब नामांतरण प्रकरण पहुंचा तो उन्होंने पटवारी प्रतिवेदन मंगवाया। इसमें पता चला कि यह शासकीय भूमि है जिसे 25 अप्रैल 1967 को आवंटित किया गया था। अधिकार अभिलेख में आवंटन की पूरी जानकारी दर्ज है। 11 जुलाई को तहसीलदार ने नामांतरण निरस्त किया है। आवंटन से प्राप्त भूमि पर कलेक्टर की अनुज्ञा आवश्यक है लेकिन रजिस्ट्री में अनुमति संलग्न नहीं है।

उप पंजीयक ने नहीं देखे दस्तावेज
वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने पंजीयन विभाग को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए पूरे प्रदेश में हर जिले का पूरा स्टाफ बदल दिया था। एक भी पुराना स्टाफ फेरबदल से नहीं बच सका, लेकिन भ्रष्टाचार ने फिर से रास्ता बना लिया। उप पंजीयक ने आवंटन जमीन की रजिस्ट्री बिना कलेक्टर अनुमति और बिक्री नकल के कर दी। इसमें भी परेशानी यह है कि आवंटन भूमि के बारे में बी-1 में लिखा ही नहीं होता कि यह आवंटन की है। इसलिए रजिस्ट्री भी हो गई।

अभी भी कई लूपहोल्स बाकी
सरकार ने रजिस्ट्री और नामांतरण को आसान बनाने के लिए आदेश दे दिए। अब रजिस्ट्री के लिए बिक्री नकल भी नहीं लगती, नामांतरण भी स्वत: हो जाएगा, लेकिन भूमि के रिकॉर्ड को अपडेट करने और बी-1 में पूरी जानकारी सही दर्ज करने की कोई व्यवस्था नहीं है। मतलब कोई भी जमीन बिना बिक्री नकल और चौहद्दी के रजिस्ट्री की जा सकती है, नामांतरण भी हो जाएगा। सिर्फ क्रेता-विक्रेता को खड़ा होना होगा। इन लूपहोल्स को बंद किए बिना आदेश पालन किए जा रहे हैं जिससे घपले बढ़ गए हैं।

क्या कहते हैं तनोज
उप पंजीयक को कैसे मालूम होगा कि जमीन आवंटन की है या नहीं। अब तो रजिस्ट्री के लिए बिक्री नकल या चौहद्दी भी नहीं लगती। बी-1 में इसका जिक्र होना चाहिए। इसलिए रजिस्ट्री हो गई। अभी भी लूपहोल्स हैं।
– तनोज कुमार भूआर्य, उप पंजीयक रायगढ़

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