
रायगढ़ । जिला मुख्यालय रायगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक ओर सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर आम जनता को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं देने की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इससे एकदम उलट नज़र आती है। जिले में झोलाछाप डॉक्टरों का गोरखधंधा खुलेआम फल-फूल रहा है, और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग और ड्रग कंट्रोल प्रशासन पूरी तरह मूकदर्शक बना हुआ है।
शहर के कई इलाकों में बिना किसी डॉक्टरी डिग्री, रजिस्ट्रेशन या लाइसेंस के कुछ लोग वर्षों से क्लीनिक चला रहे हैं। इलाज के नाम पर झोलाछाप डॉक्टर न केवल बीमारियों का गलत इलाज कर रहे हैं, बल्कि मरीजों की जान के साथ खुला खिलवाड़ भी कर रहे हैं। ये डॉक्टर फर्जी प्रिस्क्रिप्शन, अपने मन की दवाएं और ड्रिप चढ़ा कर इलाज देकर मासूम लोगों को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं — और जिम्मेदार अधिकारी इस सब पर खामोश हैं।
अधिकारी बोले थे, “अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा” — फिर चुप क्यों हैं?
जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अनिल जगत ने कुछ ही समय पहले मीडिया को दिए बयान में सख्त लहजे में कहा था कि “मेरे रहते जिले में झोलाछाप डॉक्टर नहीं चलेंगे, मैं कार्रवाई करूंगा”, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न तो किसी क्लीनिक पर अब तक छापा पड़ा , न ही किसी को नोटिस जारी किया गया और न ही एक भी फर्जी क्लीनिक सील किया गया।
अब सवाल ये उठता है कि क्या वो बयान केवल मीडिया की सुर्खियों के लिए था? या फिर कोई ऐसी अंदरूनी “समझ” है जो कार्रवाई की राह में दीवार बनी हुई है?
ड्रग इंस्पेक्टर की भी भूमिका संदिग्ध
स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ ड्रग इंस्पेक्टर की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। जिले में फर्जी क्लीनिक तक बिना लाइसेंस और वैधता के दवाइयों की बिक्री हो रही है। झोलाछाप डॉक्टर खुद को MBBS या BAMS बताकर न केवल मरीजों का इलाज कर रहे हैं, बल्कि खुलेआम इंजेक्शन, एंटीबायोटिक्स और स्टेरॉइड्स का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं — ये सब बिना किसी डर के हो रहा है।
जिले में इतने व्यापक स्तर पर यह सब चल रहा है, फिर भी ड्रग विभाग की निष्क्रियता क्या इत्तेफाक है? या फिर जिम्मेदारों की मौन सहमति इस अवैध कारोबार को परोक्ष रूप से समर्थन दे रही है?
क्या कार्रवाई से पहले किसी की जान जाना ज़रूरी है?
स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी और झोलाछाप डॉक्टरों की बेलगाम हरकतों के बीच सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का हो रहा है। हर दिन सैकड़ों लोग इन फर्जी डॉक्टरों के चंगुल में फंसते हैं, जिनका न तो इलाज सही होता है, न ही जीवन की गारंटी। ये सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ अपराध है।
सरकारें और प्रशासनिक अधिकारी तभी हरकत में आते हैं जब कोई बड़ा हादसा हो जाए, लेकिन क्या कार्रवाई का इंतज़ार अब किसी की मौत के आंकड़ों पर टिका है?
जनता चाहती है जवाब, और सख्त कार्रवाई
अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य विभाग को अपनी नींद से जागना होगा। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर क्यों झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई नहीं हो रही? क्या किसी स्तर पर सांठगांठ के तहत इन फर्जी डॉक्टरों को संरक्षण दिया जा रहा है?
जनहित में मांग की जा रही है कि जिले में तत्काल जांच अभियान चलाकर सभी अवैध क्लीनिकों को सील किया जाए, दोषी डॉक्टरों पर कानूनी कार्यवाही की जाए, और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
वरना एक दिन यह चुप्पी एक बड़े जनआक्रोश में बदल सकती है।