
रायगढ़ शहर के Sun City कॉलोनी में प्लॉट लेने से पहले सोच ले
रायगढ़। शहर में तेजी से विकसित हो रही “सन सिटी” कॉलोनी अब चर्चा का विषय बन गई है। कारण – कॉलोनी का एक बड़ा हिस्सा 33 केव्ही हाई वोल्टेज बिजली तारों के नीचे और आसपास स्थित बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों में सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि ऐसी जगह पर आखिर कॉलोनी की अनुमति कैसे दी गई।
हाई वोल्टेज तारों के बीच बसी कॉलोनी…..
बताया जा रहा है कि “सन सिटी” के चारों ओर हाईवोल्टेज लाइनें गुज़री हुई हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के इलाकों में निर्माण कार्य के दौरान बिजली सुरक्षा मानकों का पालन किया जाना आवश्यक होता है। बरसात के मौसम में इस तरह की जगहों पर बिजली से संबंधित खतरा और बढ़ सकता है।
परमिशन पर उठ रहे सवाल…..
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार शहर के कोतरा रोड थाना के पुराना रेलवे फाटक के पास , “सन सिटी” नामक कॉलोनी के केवल एक हिस्से को ही अनुमति (रेरा परमिशन) प्राप्त है। बताया गया है कि जिस हिस्से पर रेरा की मंजूरी है, उसके लेफ्ट साइड का विकास अधिकृत है, जबकि राइट साइड का निर्माण कार्य बिना स्पष्ट अनुमति के जारी बताया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो जांच होनी चाहिए कि एक ही परमिशन के तहत दोनों ओर का विकास कैसे हो रहा है।
रेलवे लाइन से सटा इलाका भी चिंता का विषय….
जानकारी के अनुसार, यह कॉलोनी रेलवे लाइन के समीप भी है। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि रेलवे सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए यहाँ निर्माण की अनुमति किन शर्तों पर दी गई। यदि फिर भी आप यहां प्लॉट लेकर मकान बनाना चाह रहे हैं तो नीचे हम आपको कुछ तकनीकी जानकारी दे रहे हैं जिससे आपको यह निर्णय लेने में आसानी होगी कि की इस कॉलोनी में प्लॉट खरीदना लाभदायक रहेगा या नहीं?
संभावित खतरे और प्रभाव….
जान-माल की सुरक्षा पर खतरा
33 केव्ही या उससे अधिक क्षमता वाले हाई टेंशन तारों से गुजरते करंट के कारण हादसे की आशंका बनी रहती है।
बारिश या तूफान में करंट धरती तक आने की संभावना रहती है।
तार टूटने या झूलने की स्थिति में जानलेवा दुर्घटनाएं हो सकती हैं।
निर्माण कार्य के दौरान लोहे की छड़, सीढ़ी या मशीनरी के संपर्क से भी करंट लग सकता है।
स्वास्थ्य पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक असर….
हाई टेंशन लाइनों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें (EMF) लंबे समय में स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं। कई अध्ययनों में इसे नींद की समस्या, तनाव, सिरदर्द और बच्चों में ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) जैसे जोखिमों से जोड़ा गया है, हालांकि भारत में इस पर स्पष्ट मानक तय नहीं हैं।
संपत्ति का मूल्य घटता है…
ऐसे क्षेत्रों में बने घरों की बाजार वैल्यू सामान्य इलाकों की तुलना में कम रहती है। खरीदार आमतौर पर हाई टेंशन वायर के नीचे या नज़दीक घर खरीदने से बचते हैं। बैंक और वित्तीय संस्थान भी ऐसे प्लॉट पर लोन देने में संकोच करते हैं।
कानूनी और बीमा संबंधी जटिलता….
यदि किसी दुर्घटना की स्थिति बनती है, तो बीमा कंपनियां नुकसान की भरपाई से इनकार कर सकती हैं क्योंकि तकनीकी रूप से यह क्षेत्र “प्रतिबंधित निर्माण क्षेत्र” (Restricted Zone) में आता है। रेरा या विद्युत सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है।
मानसून के मौसम में खतरा कई गुना बढ़ता है….
बारिश और बिजली गिरने के समय हाई टेंशन तारों से स्पार्किंग, आर्किंग और करंट लीकेज जैसी घटनाएं हो सकती हैं। इससे आस-पास बने घरों और लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
विशेषज्ञों की सलाह….
बिजली सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हाई टेंशन लाइन से कम से कम 15 से 20 मीटर तक का खुला क्षेत्र (सेफ्टी कॉरिडोर) छोड़ा जाना चाहिए। इस दायरे में किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण, लोहे की संरचना या पानी की टंकी बनाना खतरनाक माना जाता है।
प्रशासनिक जांच की अपेक्षा….
स्थानीय नागरिकों और जानकारों का मानना है कि नगर एवं विकास विभाग को इस पूरे प्रकरण की जांच करनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कॉलोनी के किन हिस्सों को वैध अनुमति प्राप्त है और किन्हें नहीं। फिलहाल इस विषय पर प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
