Home रायगढ़ 60 रुपए लीटर में भी मिल रहा घटिया दूध: उत्पादन से ज्यादा खपत! कौन बेच रहा है मिलावटी और सिंथेटिक दूध..?

60 रुपए लीटर में भी मिल रहा घटिया दूध: उत्पादन से ज्यादा खपत! कौन बेच रहा है मिलावटी और सिंथेटिक दूध..?

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जानिए क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े और हमारी ग्राउंड रिपोर्ट..
रायगढ़। रायगढ़ जिले में पिछले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस सफ्ताह पर 22 सितंबर से दूध का मूल्य ₹60 प्रति लीटर हो गया। दुग्ध उत्पादकों के स्वयंभू संगठन के द्वारा यह निर्णय लिया गया। दूध का मूल्य तो बढ़ गया मगर उसकी क्वालिटी और भी ज्यादा घटिया हो गई। एक्सपर्ट बताते हैं कि इस समय रायगढ़ में दूध में भारी मात्रा में मिलावट केसाथ साथ सिंथेटिक दुग्ध भी काफी मात्रा में बिक रहा है।

सिर्फ 15% गायों पर ही दूध का दारमदार
भारत सरकार की एक संस्था नाबार्ड द्वारा जारी पिछली रिपोर्ट के अनुसार “धरमजयगढ़ लैलूंगा घरघोड़ा, तमनार, रायगढ़, पुसौर, खरसिया और सारंगढ़ बरमकेला ब्लॉक मिलकर देसी गाय 4,74,580, हाइब्रिड गाय 1,06,690 और देशी भैंस 47,688 है। दुग्ध उत्पादन में देशी गाय 75% और हाइब्रिड गाय 15% है। देसी गाय का प्रतिदिन उत्पादन लगभग 1 लीटर से भी कम है। किसान देशी गाय का पालन मुख्यत: गोबर खाद और देशी नर बेल के लिए करते हैं।”

रिपोर्ट्स की माने तो भले देसी गाय संख्या में ज्यादा हो लेकिन दुग्ध उत्पादन और शहरी क्षेत्र में वितरण के लिए पूरा दारोमदार हाइब्रिड नस्ल की गाय पर है। जिसकी पूरी संख्या का मात्रा 15% है।
माध्यम से ऋण प्रदान करने की आवश्यकता है.”

इन रिपोर्ट्स की माने तो इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ” रायगढ़ जिले में बाहरी लोगों बड़ी संख्या में है। इसलिए दूध की आपूर्ति मांग के अनुपात नहीं हो पाती।”

तो ऐसे में सवाल यह है कि जब दूध की उत्पादन रायगढ़ जिले में उतनी है नहीं, जितनी खपत है, रिपोर्ट यह भी बताती है कि शहरी क्षेत्र मात्र 58 दुग्ध इकाई और ग्रामीण क्षेत्र में मात्र 415 दुग्ध व्यवसायी है। सरकार के पास सिर्फ 20,000 लीटर प्रतिदिन रोजाना दूध संकलन का रिकॉर्ड है और पूरे जिले भर में खपत करीब एक से डेढ़ लाख लीटर से ज्यादा है। तो ऐसे में बाकी का दूध आ रहा है तो कहां से आ रहा है..? इसकी जांच जिला प्रशासन को करनी चाहिए..!

तीन से चार घंटे में हो जाता है बड़ा खेल
दूध के बढ़े हुए दर की छानबीन करने के लिए करने के लिए जब हमने गांव का रुख किया तो पता चला कि, यहां पर जो असली दूध उत्पादन करते हैं, उनसे 30 से 35 रुपए लीटर में बिचौलिए दूध खरीद करते हैं और बाजार में यही दूध ₹60 लीटर में बेचा जाता है। जबकि इस दूध का पाश्चरीकरण का कोई प्रक्रिया नहीं किया जाता जैसे की सरकारी दुग्ध संस्थाओं द्वारा किया जाता है। मात्र 3 घंटे में यही दूध मिलावट के साथ डबल होकर ₹60 में बिकता है।

अब नहीं तो कब..
जिला प्रशासन को एक जांच दल बनाकर  बिचौलियों और नकली दुग्ध उत्पादकों पर निगरानी बढ़ानी चाहिए। तभी दूध का दूध, पानी का पानी करना संभव है। नहीं तो वक्त के साथ यह सिंडिकेट और भी फलेगा फूलेगा, और इसका भारी नुकसान उठाने के लिए हम सभी को तैयार रहना चाहिए।

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